*संस्कृत भारती का विस्तार और ‘प्रणव’ की विशेषताएँ*
अखिल भारतीय संगठन मंत्री जयप्रकाश गौतम ने प्रस्तावना करते हुये कहा कि संस्कृतभारती की स्थापना वर्ष 1981 में संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने के उद्देश्य से हुई थी। यह आगे चलकर एक व्यापक संस्कृत आंदोलन के रूप में विकसित हुआ और 1995 में इसे ‘संस्कृतभारती’ नाम प्राप्त हुआ।
"संस्कृत भारती का विस्तार एवं भावी लक्ष्य
संस्कृत भारती के अखिल भारतीय संगठन मन्त्री जयप्रकाश गौतम ने संगठन की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 1981 में कुछ छात्रों द्वारा शुरू हुआ यह आंदोलन आज 28 देशों और भारत के 660 जिलों तक फैल चुका है। यह भवन विशाल परिसर लगभग 50,000 वर्ग फुट में फैला है । यह कार्यालय आधुनिक सुविधाओं और प्राचीन परम्परा का संगम है। मुख्य लक्ष्य देश की 10% जनसंख्या तक संस्कृत पहुँचाना और 12 भाषाओं के माध्यम से पत्राचार द्वारा शिक्षण कार्य को गति देना है।
यहां वास्तु, शिल्प, वनस्पति विज्ञान (बॉटनी) और धर्मशास्त्र इत्यादि विषयों पर परामर्श के लिए विद्वान सदैव उपलब्ध रहेंगे।
*देशभर से जुटे विद्वान, बना ऐतिहासिक क्षण*
समारोह में सर्वाधिक सहयोग देने वाले ११ व्यक्ति एवं संस्थाओं के प्रतिनिधियों का सम्मान किया गया।
समारोह में संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय ने सबका स्वागत किया, दिल्ली न्यास के अध्यक्ष प्रवीण कान्त जी ने धन्यवाद ज्ञापित किया। समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश सोनी, केन्द्रीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारामन, डॉ. मुरलीमनोहर जोशी, पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री. अनुराग ठाकुर, भारतीय भाषा समिति के अध्यक्ष चम्मूकृष्ण शास्त्री, संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के निदेशक प्रो. चांदकिरण सलूजा, संस्कृतभारती के न्यासी श्री. दिनेश कामत, अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्रीश देवपुजारी, दिल्ली प्रान्ताध्यक्ष डॉ. वागीश भट्ट, अमेरिका संस्कृत भारती अध्यक्ष श्री. नटेश जानकीरमण सहित देश-विदेश से आए शिक्षाविद्, विद्वान और संस्कृत प्रेमी उपस्थित रहे। यह भवन अब संस्कृत के प्रचार-प्रसार, शिक्षकों के प्रशिक्षण और वैश्विक शोध के एक प्रमुख केंद्र के रूप में कार्य करेगा।
Обсуждение 0
Обсуждение не доступно в веб-версии. Чтобы написать комментарий, перейдите в приложение Telegram.
Обсудить в Telegram