सोचने की आज़ादी तो हमेशा है,
पर हम ये भूल जाते हैं कि क्या सोचना है, ये भी हमारे हाथ में है।
मन वहीं जाता है, जहाँ ध्यान जाता है।
अगर बार-बार दर्द को सोचोगे, तो वो और गहरा लगेगा।
और अगर उसी मन को ईश्वर की तरफ मोड़ दोगे,
तो भीतर शांति अपने आप बहने लगेगी।
हमारी भावनाएं यूँ ही नहीं बनतीं—
ये हमारी बार-बार की सोच का परिणाम होती हैं।
इसलिए मन से लड़ो मत… उसे दिशा दो।
दर्द से → दिव्यता की ओर
उलझनों से →इश्वर की याद की ओर
क्योंकि जो मन दर्द को पकड़ सकता है,
वही मन ईश्वर से जुड़कर सुकून, प्रेम और आनंद भी पा सकता है। ✨
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