एक साधारण पत्थर आराम में रहकर मूर्ति नहीं बनता।
वह पूजनीय इसलिए बनता है क्योंकि वह हर चोट सहता है।
हर हथौड़े की मार उसके भीतर छिपे रूप को बाहर लाती है।
हर कटाव उसे और निखारता है।
अगर पत्थर बोल पाता तो शायद पूछता
“कब तक यह चोट सहनी पड़ेगी?”
लेकिन वह चुप रहता है…
और उसी सहनशीलता से देवत्व प्रकट होता है।
जीवन की परिस्थितियाँ भी छेनी की तरह हैं।
वे तोड़ने नहीं, तराशने आती हैं।
ये मत पूछो, कब तक सहना है।
ये देखो इससे तुम कितना निखर रहे हो।
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