संसद में सरकार से मैंने पूछा - पिछले वर्ष ₹16,500 करोड़ के सार्वजनिक कार्यों के ठेकों में से कितने ठेके दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के व्यवसायों को मिले?
उनका जवाब बेहद चिंताजनक था - सरकार इस संबंध में कोई डेटा ही नहीं रखती।
नीति ये है कि सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया के तहत 25% खरीद MSMEs से होनी चाहिए, जिसमें से 4% खरीद दलित और आदिवासी उद्यमियों के लिए निर्धारित है। लेकिन जब बात सबसे बड़े और लाभकारी ठेकों, सार्वजनिक कार्यों की आती है, तो सरकार कहती है कि यह “अनिवार्य” नहीं है।
यह केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं है। यह मोदी सरकार की नीतियों के जरिये जानबूझकर बनाई गई बहिष्कार की व्यवस्था है जो सामाजिक और आर्थिक न्याय को कमजोर करती है।
सवाल सीधा है: बहुजन उद्यमियों को देश के सबसे बड़े सार्वजनिक ठेकों से बाहर क्यों रखा जा रहा है?
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