2023 में 66,955 नौजवानों ने जान दी - पिछले 10 सालों में छात्र आत्महत्याएँ 65% बढ़ीं।
मैंने इस महत्वपूर्ण और संवेदनशील मसले पर सरकार से सवाल किया। जवाब क्या मिला? सिर्फ झूठे बहाने, खुद की तारीफ़ें - जवाबदेही ज़ीरो।
मैंने रोहित वेमुला जैसे होनहार छात्रों का भी ज़िक्र किया - जाति और आत्महत्या के बीच संबंध पर सवाल उठाया। लेकिन सरकार ने छात्र आत्महत्याओं के कारणों में जातिगत भेदभाव को मानने से ही इनकार कर दिया।
मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च पूछा - कोई जवाब नहीं। जातिगत भेदभाव के लिए संस्थागत जवाबदेही का कानून लाने का इरादा पूछा - इस पर भी कोई जवाब नहीं।
जब सरकार समस्या को मानने को ही तैयार नहीं, तो समाधान कैसे निकलेगा? इनका तरीका यही है - आँखें मूंद लो, नज़रअंदाज़ करो, और सच को छुपाते रहो।
यह सरकार हमारे नौजवानों की परवाह नहीं करती, और देश के भविष्य की रक्षा के लिए कोई योजना नहीं है।
हमारे छात्रों को खामोशी नहीं - एक ऐसी सरकार चाहिए जो उनकी बात सुने और उनकी भलाई की परवाह करे।
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