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Nirmal Gehlot
@NirmalGehlot
16.12.2022 14:24
लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल
● वर्ष 1950, भारत के गणतंत्र वर्ष, 14 अक्टूबर के दिन महाराष्ट्र के पुणे में अरुण नाम के एक बालक का जन्म हुआ। वह ब्रिगेडियर एम.एल. क्षेत्रपाल और महेश्वरी क्षेत्रपाल के बड़े बेटे थे। इस प्रतिष्ठित परिवार की कई पीढ़ियों ने भारतीय सैन्य दल की सेवा की है। उनकी शिक्षा हिमाचल प्रदेश के सनावर के लॉरेंस स्कूल में हुई। हँसमुख व्यक्तित्व वाले अरुण ने शैक्षणिक एवं खेलकूद दोनों ही क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। अपनी बहुमुखी प्रतिभा के कारण वे विद्यालय के विद्यार्थी प्रमुख बनाए गए। इनके विद्यालय का सिद्धांत था -कभी हिम्मत न हारो' और इन्होंने हमेशा इस सिद्धांत का अनुसरण किया।
● अरुण वर्ष 1967 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एन.डी.ए.), खडगवासला, पुणे और उसके बाद भारतीय सैन्य अकादमी (आई.एम.ए.), देहरादून में शामिल हुए। 13 जून, 1971 को वे भारतीय सेना की 17 पूना हॉर्स में कमीशन अधिकारी के रूप में शामिल हुए।
● महज छह महीने बाद ही 3 दिसंबर, 1971 को युद्ध प्रारंभ हो गया। वर्ष 1965 के युद्ध की ही तरह इस युद्ध के दौरान भी टैंक युद्ध बेहद निर्णायक एवं भयंकर रहा । ये युद्ध ज़्यादातर पश्चिमी मोर्चे पर, पंजाब में लड़े गए। शकरगढ़ सेक्टर का 'बसंतर का युद्ध' इन्हीं में से एक था। इस क्षेत्र के भौगोलिक महत्त्व को देखते हुए दोनों ही पक्ष इस जगह पर अपना पूर्ण अधिकार चाहते थे। पठानकोट-जम्मू राज्यमार्ग से होते हुए भारत-पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा इस जगह से सिर्फ़ 10 किलोमीटर की दूरी पर थी। इस क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए भारतीय सैन्य टुकड़ी पाकिस्तानी क्षेत्र में दस मील तक पहुँच चुकी थी। 2/लेफ़्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल इस युद्ध में 'फामागुस्ता' नामक सेंचुरियन टैंक का संचालन कर रहे थे।
● पाकिस्तान के विरुद्ध चल रहे इस ऑपरेशन में एक भागीदार के तौर पर शामिल 17 पूना हॉर्स ने रावी नदी की एक सहायक नदी 'बसंतर नदी' पर एक पुल बनाया। यह निर्माण कार्य 15 दिसंबर की रात को ही पूरा कर लिया गया था। इस पूरे क्षेत्र में दुश्मन ने बारूदी सुरंगें बिछाई हुई थीं। पुल पर दुश्मन की बख्तरबंद गाड़ियों को सक्रिय देखकर अविलंब भारतीय टुकड़ियों को टैंकों से सहयोग देने के लिए बुलाया गया।
● 17 पूना हॉर्स ने इन प्राणघातक सुरंगों से होकर ही खतरनाक मिशन पर आगे बढ़ने का फैसला किया और मध्यरात्रि तक इस रेजिमेंट ने पुल पर पैदल सेना तथा बख्तरबंद गाड़ियों से संपर्क स्थापित कर लिया। 16 दिसंबर की सुबह दुश्मन ने एक बख्तरबंद रेजिमेंट के सहयोग से जवाबी हमला किया। लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय सैनिक पाकिस्तानी सैनिकों की तुलना में बहुत ही कम थे, इसलिए उन्होंने सुदृढीकरण के लिए अतिरिक्त सैन्य बल की माँग की। 2/लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल अपनी टुकड़ी के साथ ही पास में नियुक्त थे; उन्होंने दुश्मनों के साथ सीधी टक्कर लेने का निर्णय लिया। उनकी टुकड़ी को दुश्मनों की अविराम गोलीबारी का सामना करना पड़ा। परंतु उन्होंने दुश्मन के मोर्चे पर लगातार हमला किया, उन्हें पूरी तरह से क्षति पहुँचायी और इस तरह उनसे बदला लिया। युद्ध में मिली इस सफलता से मनोबल में वृद्धि हुई, जिसके फलस्वरूप उन्होंने दुश्मनों के टैंक को खदेड़ना शुरू कर दिया। लेकिन दुश्मन ने बाजी पलटने के लिए जल्द ही एक पूर्ण बख्तरबंद टुकड़ी तैनात की।
● इसके बाद भयंकर तोप युद्ध हुआ। उस युद्ध में 2/ लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल ने अकेले ही दुश्मन के कई टैंकों को नष्ट कर दिया। उसी समय उनके टैंक पर दुश्मनों ने प्रहार किया जिससे उनका टैंक आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया। उनके ऊपर पड़े खतरे को भाँपकर, उनके उच्च अधिकारियों ने उन्हें जलते हुए टैंक से तुरंत बाहर निकलने का आदेश दिया। लेकिन उन्होंने बड़ी विनम्रता से, उस आदेश का प्रतिकार करते हुए कहा, “नहीं श्रीमान, मैं अपने टैंक को छोड़कर नहीं जाऊँगा। मेरी बंदूक में अभी भी गोलियाँ हैं मैं प्रतिशोध लेकर...।”
● अपने दृढ़ निश्चय का प्रदर्शन करते हुए, उन्होंने बहुत ही नज़दीक से बचे हुए टैंकों पर आखिरी हमला प्रारंभ किया और दुश्मन के बचे हुए टैंकों को नज़दीक से नष्ट करना शुरू कर दिया। उन्होंने शत्रु के आखिरी टैंक को भी नष्ट कर दिया, जो मुश्किल से 100 मीटर की दूरी पर था। तभी ऐसी स्थिति में उनके टैंक पर एक और प्रहार हुआ। लेकिन, उनकी इस्पाती इच्छाशक्ति का हथियार उनके पास था। उन्होंने दुश्मन के टैंकों का कड़ा प्रतिरोध किया और अपनी अंतिम साँस तक दुश्मन को एक बड़ी जीत की ओर बढ़ने से रोके रखा।
● 16 दिसंबर, संयोग देखिए कि अरुण क्षेत्रपाल की शहादत के दिन ही, पूर्वी मोर्चे पर पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण किया। इस दिन को 'विजय दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
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